Kabir Das ke Dohe with Meaning

by Hussain
0 comment 145 views

[ad_1]

You must have heard your grandmother and grandmother saying Kabir Das’s couplets on the matter. But Kabir Ke Dohe if you believe in the things of the grandmother and grandmother’s generation, then believe me you are making a huge mistake. Our generation needs Kabir Das born in the fifteenth century today more than ever.

Kabir Das showed centuries ago that we are still afraid of doing it – Kabir Das openly challenged the big luminaries of his time and all the religious evils of the society. Above all, the way Kabir Das put forth the way of living was unmatched.

Kabir Ke Dohe can teach us a very beautiful way of living life and can help us a lot in difficult watches. Kabir can still save us from making big mistakes, from doing bad things to anyone. Do you find all these things bookish? Let’s put an example in front of you in your life:

It often happens that we do good for others, but by repeatedly turning people hurt us – they spew venom against us.

Then it comes to mind that what is the benefit of doing good to others? If everyone is doing wrong then why should I do good for everyone? And we also get such instructors. Take this opportunity to test our goodness and help immensely to pass this examination – Kabir Das:

Kabir ke Dohe with Meaning

संत ना छाडै संतई, कोटिक मिले असंत ।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटत रहत भुजंग ।

(अर्थ: सच्चा इंसान वही है जो अपनी सज्जनता कभी नहीं छोड़ता, चाहे कितने ही बुरे लोग उसे क्यों न मिलें, बिलकुल वैसे ही जैसे हज़ारों ज़हरीले सांप चन्दन के पेड़ से लिपटे रहने के बावजूद चन्दन कभी भी विषैला नहीं होता ।)

कहिये, क्या कहते हैं आप? है आप में यह हौसला? कहते हैं बुरा काम करना आसान है, पर सबके लिए अच्छा करते चले जाना सिर्फ ताकतवर लोगों के बस की बात होती है ।

Read Also: Tulsidas ke Dohe with Meaning

वाकई दुनिया में हमारा बुरा चाहने वाले और हमारे साथ बुरा करने वालों की कोई कमी नहीं है । सवाल यह है कि ऐसे में हम क्या करें? क्या हम भी उसी बुराई को अपना लें? जवाब देते हैं कबीर दास :

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय ।
सारसार को गहि रहै थोथा देई उड़ाय ।

(अर्थ: एक अच्छे इंसान को सूप जैसा होना चाहिए जो कि अनाज को तो रख ले पर उसके छिलके व दूसरी गैर-ज़रूरी चीज़ों को बाहर कर दे ।)

कितना बेहतरीन तरीका सुझाया है कबीर ने! अगर चारों ओर गंदगी है, तो उससे हम अपना मन गंदा क्यों करें? सबसे बड़ी चीज़ है अपने मन को साफ़ और सुन्दर रखना, पर यह अपने आप नहीं होता । जैसे बाहर की धूल हमारे कमरे को गन्दा कर देती है, वैसे ही दुनिया की मैल भी हम सबके मन को गंदा करती है । उसे साफ़ करते रहना होता है ।

हमें घर साफ़ करना और नहाना तो याद रहता है, लेकिन मन को कपड़ा लेकर साफ़ करते रहना भूल जाता है । यह याद दिलाने का काम कबीर करते हैं :

तन को जोगी सब करे, मन को विरला कोय ।
सहजे सब विधि पाइए, जो मन जोगी होए ।

(अर्थ: हम सभी हर रोज़ अपने शरीर को साफ़ करते हैं लेकिन मन को बहुत कम लोग साफ़ करते हैं । जो इंसान अपने मन को साफ़ करता है, वही हर मायने में सच्चा इंसान बन पाता है ।)

Kabir बार-बार अपने दोहों में झूठे पाखंड और ऊपरी ढोंग से बचने के लिए कहते हैं । लोग सोचते हैं कि सिर्फ ऊपरी धार्मिक कर्मकाण्ड करके वे अपने मन को साफ़ कर सकते हैं, कबीर कहते हैं :

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ।

(अर्थ: माला फेरते-फेरते युग बीत गया लेकिन मन में जमी बुराइयां नहीं हटीं । इसीलिए, यह लकड़ी की माला को हटा कर मन की साधना करो!)

कबीर ने ऐसे ही ढोंगी लोगों पर, जो ऊपर से अपने आप को शुद्ध और महान दिखाने की कोशिश करते हैं, व्यंग्य कसते हुए कहा था :

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए ।
मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए ।

(अर्थ: अगर मन का मैल ही नहीं गया तो ऐसे नहाने से क्या फ़ायदा? मछली हमेशा पानी में ही रहती है, पर फिर भी उसे कितना भी धोइए, उसकी बदबू नहीं जाती ।)

ठीक है, कहने के लिए या उपदेश देने के लिए तो यह बात अच्छी है, पर क्या वाकई ऐसा कर पाना आज के ज़माने में प्रैक्टिकल है भी? हममें से बहुत सारे लोग ये बातें सुनकर ऐसा ज़रूर सोचते हैं । इसका जवाब किताबों में नहीं है, कबीर के पास है :

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम का जो पढ़े सो पंडित होय ।

(अर्थ: मोटी-मोटी किताबें पढ़कर कभी कोई ज्ञानी नहीं बना । “प्रेम” शब्द का ढाई अक्षर जिसने पढ़ लिया, वही सच्चा विद्वान बना ।)

यह भी पढ़ें: Tulsidas ke Dohe

ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई न संग ।
प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत ।

(अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जिसने कभी अच्छे लोगों की संगति नहीं की और न ही कोई अच्छा काम किया, उसका तो ज़िन्दगी का सारा गुजारा हुआ समय ही बेकार हो गया । जिसके मन में दूसरों के लिए प्रेम नहीं है, वह इंसान पशु के समान है और जिसके मन में सच्ची भक्ति नहीं है उसके ह्रदय में कभी अच्छाई या ईश्वर का वास नहीं होता ।)

Kabir की सोच बड़ी साफ़ और सुलझी हुई सोच थी । उनका मानना था कि वह आदमी जिसके मन में दुनिया के लिए प्यार है, वही असली इंसान बन सकता है और दुनिया भर के लिए यह प्यार पैदा होता है दूसरे के दुःख-तकलीफ को अपना समझे से :

कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर ।
जो पर पीर न जानही, सो का पीर में पीर ।

(अर्थ: जो इंसान दूसरों की पीड़ा को समझता है वही सच्चा इंसान है । जो दूसरों के कष्ट को ही नहीं समझ पाता, ऐसा इंसान भला किस काम का!)

आज ज़्यादातर लोग सिर्फ अपने बारे में, अपने दुःख-सुख के बारे में सोचते है, जैसे कि जानवर, जो सिर्फ अपने बारे में ही सोचते हैं, लेकिन हमें जो चीज़ जानवरों से अलग करती है वह है हमारा दूसरों से लगाव और जुड़ाव । कबीर कहते हैं :

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे ।

(अर्थ: मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तुम मुझे रौंद रहे हो, पर एक दिन ऐसा भी आयेगा जब तुम भी मिट्टी हो जाओगे और मैं तुम्हें रौंदूंगी!)

कितनी दूर तक की देखते हैं कबीर! हम सब हर वक्त अपने बारे में ही चिंतित रहते हैं पर यह भूल जाते हैं कि एक दिन हमें भी मिट्टी में ही विलीन हो जाना है और पीछे सिर्फ हमारे किये हुए अच्छे या बुरे काम रह जाने हैं ।

कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये,
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये ।

(अर्थ: कबीर कहते हैं कि जब हम पैदा हुए थे तब सब खुश थे और हम रो रहे थे । पर कुछ ऐसा काम ज़िन्दगी रहते करके जाओ कि जब हम मरें तो सब रोयें और हम हँसें ।)

यह हुआ असली इंसान की तरह ज़िन्दगी जीने का तरीका – जिंदादिली और सच्चाई के साथ! तो कम से कम अब तो आप मानेंगे कि कबीर एक बेहतर ज़िंदगी जीने में वाकई हमारी मदद कर सकते हैं ।

ज़िन्दगी तो सब जीते हैं लेकिन कैसे जीते हैं यह है सवाल और इसे तय करना बिलकुल हमारे हाथों में है! कबीर ने ऐसी ज़िंदगी जी जो आज भी मिसाल है, तो आइये हम भी कुछ ऐसी ही जिंदगी जी कर दिखाए और दूसरों के लिए मिसाल बने! तो कहिये, क्या कहते हैं आप?


तो फ्रेंड्स यह थे kabir ke dohe अर्थ सहित हिंदी में, हमें विश्वास है की यह दोहे आपके जीवन को आसान और समृद्ध बनाने में बहुत ही उपयोगी साबित होंगे । शुक्रिया! 🙂

[ad_2]

Source link

Related Posts

Leave a Comment