Tulsidas ke Dohe with Meaning

by Hussain
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Goswami Tulsidas, the author of Ramcharitmanas, is also popular for his couplets, Tulsidas of Dohe is very good, enlightening and excellent in life.

Therefore, today we have come for all you dear readers with the meaning of the couplets of Tulsidas, which you will like very much.

Tulsidas ke Dohe English with Meaning

तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर ।
बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर ।

तुलसीदास जी कहते हैं कि मधुर वाणी सभी ओर सुख प्रकाशित करती हैं और यह हर किसी को अपनी और सम्मोहित करने का कारगर मंत्र है इसलिए हर मनुष्य को कटु वाणी त्याग कर मीठे बोल बोलने चाहिए ।

काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान ।
तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान ।

तुलसीदासजी कहते हैं कि जब तक काम, क्रोध, घमंड और लालच व्यक्ति के मन में भरे पड़े हैं, तब तक ज्ञानी और मूढ़ व्यक्ति के बीच कोई अंतर नहीं होता है, दोनों ही एक जैसे हो जाते हैं ।

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तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर ।
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि ।

तुलसीदास जी कहते हैं कि सुंदर परिधान देखकर न सिर्फ मूढ़ बल्कि बुद्धिमान मनुष्य भी झांसा खा जाते हैं । जैसे मनोरम मयूर को देख लीजिए उसके वचन तो अमृत के समरूप है लेकिन खुराक सर्प का है ।

बचन वेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि ।
सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि ।

तुलसीदास कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति को उसकी मीठी वाणी और अच्छे पोशाक से यह नहीं जाना जा सकता की वह सज्जन है या दुष्ट । बाहरी सुशोभन और आलंबन से उसके दिमागी हालात पता नहीं लगा सकते । जैसे शूपर्णखां, मरीचि, पूतना और रावण के परिधान अच्छे थे लेकिन मन गंदा ।

तुलसी जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोई ।
तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोई ।

तुलसीदास कहते हैं कि दूसरों की निंदा करके खुद की पीठ थपथपाने वाले लोग मतिहीन है । ऐसे मूढ़ लोगो के मुख पर एक दिन ऐसी कालिख लगेगी जो मरने तक साथ नहीं छोड़ेगी ।

तनु गुण धन धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान ।
तुलसी जिअत बिडम्बना, परिनामहू गत जान ।

तुलसीदास कहते हैं कि सुंदरता, अच्छे गुण, संपत्ति, शोहरत और धर्म के बिना भी जिन लोगों में अहंकार है । ऐसे लोगों का जीवनकाल कष्टप्रद होता है जिसका अंत दुखदाई ही होता है ।

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु ।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ।

बहादुर व्यक्ति अपनी वीरता युद्ध के मैदान में शत्रु के सामने युद्ध लड़कर दिखाते है और कायर व्यक्ति लड़कर नहीं बल्कि अपनी बातों से ही वीरता दिखाते है ।

सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि ।
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ।

अपने हितकारी स्वामी और गुरु की नसीहत ठुकरा कर जो इनकी सीख से वंचित रहता है, वह अपने दिल में ग्लानि से भर जाता है और उसे अपने हित का नुकसान भुगतना ही पड़ता है ।

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार ।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ।

अगर मनुष्य अपने भीतर और अपने बाहर जीवन में उजाला चाहता है तो तुलसीदास कहते हैं कि उसे अपने मुखरूपी प्रवेशद्वार की जिह्वारूपी चौखट पर राम नाम की मणि रखनी चाहिए ।

मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक ।

तुलसीदास जी कहते हैं कि अधिनायक (लीडर) मुख जैसा होना चाहिए, जो खान-पान में तो इकलौता होता है लेकिन समझदारी से शरीर के सभी अंगों का बिना भेदभाव समान लालन-पालन करता है ।

सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस ।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ।

तुलसीदास जी कहते हैं कि मंत्री, हकीम और गुरु यह तीनों अगर लाभ या भय के कारण अहित की मीठी बातें बोलते है तो राष्ट्र, देह और मज़हब के लिए यह अवश्य विनाशकारी साबित होता है और इस वजह से राष्ट्र, देह और मज़हब का जल्द ही पतन हो जाता है ।

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि ।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकति हानि ।

गोस्वामी जी कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने नुकसान का अंदेशा लगाकर अपने पनाह में आयें शरणार्थी को नकार देते है, वो नीच और पापी होते हैं । ऐसे लोगो से तो दूरी बनाये रखना ही उचित है ।

दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान ।
तुलसी दया न छांड़िए जब लग घट में प्राण ।

तुलसीदास जी कहते हैं कि दया, करुणा धर्म का मूल है और घमंड सभी दुराचरण की जड़ इसलिए मनुष्य को हमेशा करुणामय रहना चाहिए और दया का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए ।

आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह ।
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह ।

जिस समूह में शिरकत होने से वहां के लोग आपसे खुश नहीं होते और वहां लोगों की नज़रों में आपके लिए प्रेम या स्नेह नहीं है, तो ऐसे स्थान या समूह में हमें कभी शिरकत नहीं करना चाहिए, भले ही वहाँ स्वर्ण बरस रहा हो ।

तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक ।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक ।

तुलसीदास जी कहते हैं कि किसी भी विपदा से यह सात गुण आपको बचाएंगे, 1 –  आपकी विद्या, ज्ञान 2 – आपका विनय,विवेक, 3 – आपके अंदर का साहस, पराक्रम 4 – आपकी बुद्धि, प्रज्ञा 5 – आपके भले कर्म 6 – आपकी सत्यनिष्ठा 7 – आपका भगवान के प्रति विश्वास ।

तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान ।
भीलां लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण ।

तुलसीदास जी कहते हैं कि समय समय बलवान न मनुष्य महान अर्थात मनुष्य बड़ा या छोटा नहीं होता वास्तव में यह उसका समय ही होता है जो बलवान होता है । जैसे एक समय था जब महान धनुर्धर अर्जुन ने अपने गांडीव बाण से महाभारत का युद्ध जीता था और एक ऐसा भी समय आया जब वही महान धनुर्धर अर्जुन भीलों के हाथों लुट गया और वह अपनी गोपियों का भीलों के आक्रमण से रक्षण भी नहीं कर पाया ।

तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग ।
सबसे हस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग ।

तुलसीदास जी कहते हैं, इस जगत में भांति भांति (कई प्रकार के) प्रकृति के लोग है, आपको सभी से प्यार से मिलना-जुलना चाहिए । जैसे एक नौका नदी से प्यार से सफ़र कर दूसरे किनारे पहुंच जाती है, ठीक वैसे ही मनुष्य भी सौम्य व्यवहार से भवसागर के उस पार पहुंच जाएगा ।

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु ।
जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास ।

तुलसीदास जी कहते हैं कि राम का नाम कल्पवृक्ष (हर इच्छा पूरी करनेवाला वृक्ष) और कल्याण का निवास (स्वर्गलोक) है, जिसको स्मरण करने से भाँग सा (तुच्छ सा) तुलसीदास भी तुलसी की तरह पावन हो गया ।

तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए ।
अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए ।

तुलसीदास कहते हैं, भगवान पर भरोसा करें और किसी भी भय के बिना शांति से सोइए । कुछ भी अनावश्यक नहीं होगा, और अगर कुछ अनिष्ट घटना ही है तो वो घटकर ही रहेगा इसलिए अनर्थक चिंता, परेशानी छोड़ कर मस्त जिए ।

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